Essay On Nature Conservation In Hindi

व्यर्थ हो रहा है प्रकृति का उपहार

वर्षा-जल प्रबंधन में ताल-तलैयों की अनदेखी ने इस स्थिति को और बदतर बनाया है
- प्रताप सोमवंशी

प्रकृति जब नाराज होती है, तो उसके कोप से जूझने की हमारी तैयारी अकसर कम पड़ जाती है। बाढ़, सूखा और अकाल इसी की परिणति हैं। दूसरी तरफ, प्रकृति जब कुछ देना चाहती है, तो हमारे पात्र छोटे पड़ जाते हैं और हम उस उपहार को समेट नहीं पाते। इस साल अपेक्षा से कई गुना बेहतर बारिश प्रकृति का पृथ्वी के लिए एक उपहार बनकर आई है। लेकिन इसकी नियति भाप बनकर उड़ जाने या समुद्र में मिल जाने की है। इस पानी से खेती के नुकसान की तुलना में फायदे का प्रतिशत कम बैठ रहा है। हम प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग और संरक्षण कैसे करें, इस पर हमारी उलझाऊ नीतियों की मुश्किलें एक बार फिर हमारे सामने हैं।

अगस्त के तीसरे सप्ताह तक अधिकतम 1,330 मिलीमीटर तक बारिश हो चुकी है। शेष मौसम में और 300 मिलीमीटर से अधिक बारिश की संभावना है। विशेषज्ञों का अनुमान था कि पूरे सीजन में 800 मिलीमीटर बारिश होगी। वर्ष 2006 और 2007 में 600 मिलीमीटर की औसत बारिश को देखते हुए इस साल बारिश की संभावना बेहतर बताई जा रही थी। दशकों बाद खुलकर बरसे पानी का सुख बांटने के लिए मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में तो विधिवत दीपावली मनाई गई। यह इलाका बुंदेलखंड के मध्य प्रदेश का हिस्सा है, जहां सूखे के कारण किसानों की आत्महत्या की लगातार खबरें आ रही थीं।

देश के सबसे तबाह इलाके बुंदेलखंड में पिछले साल के 372 मिलीमीटर की जगह इस साल अगस्त के दूसरे सप्ताह तक औसत 1,072 मिलीमीटर वर्षा हुई है। यह पिछले दो दशकों का कीर्तिमान है। लेकिन बारिश संबंधी इन सूचनाओं को हम खुशखबरी की तरह नहीं ले सकते, क्योंकि जल प्रबंधन के दक्ष जनों के अनुसार हम सिर्फ 10 फीसदी जल का उपयोग ही कर पाएंगे। विकास के नाम पर सड़कें और इमारतें बनाते समय हम पानी के आने-जाने के रास्ते बंद करते जा रहे हैं। अव्वल तो तालाब बचे नहीं, और जो हैं, उनमें पानी के पहुंचने के मार्ग में तरह-तरह की बाधाएं खड़ी हो चुकी हैं। गुजरे दशकों में पानी को बचाने के जो सरकारी इंतजाम किए गए, उनमें पैसा तो पानी की तरह बहाया गया, नतीजा कुछ बूंदों को बटोरने भर रहा।

बुंदेलखंड जिले के जालौन क्षेत्र में 400 बंधिया बनाई गई थीं। इनमें से आधी से ज्यादा तबाह स्थिति में हैं या फिर बनी ही नहीं। ललितपुर जिले में तीन करोड़ रुपये से चल रहा काम निरर्थक हो चुका है। तीन बरस पहले भी इसी इलाके में बादहा और रसिन बांध के नाम पर तीन-तीन करोड़ रुपये भुगतान किए जाने के मामले ने जब तूल पकड़ा, तो जांच बिठाई गई। तकनीकी जांच समिति द्वारा सत्यापित होने के बाद संबंधित दोषियों को जेल भेजा गया। इन उदाहरणों को बताने का मकसद यह है कि सूखा जहां बजट को सोखने का जरिया बनता है, वहीं बारिश भ्रष्टाचार को विशाल समुद्र बना देती है। नेशनल एग्रीकल्चर फाउंडेशन के एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2020 तक सिंचाई-व्यवस्था के नाम पर 6,000 करोड़ रुपये डीजल की भेंट चढ़ जाएंगे। कहा जा रहा है कि पेट्रोल के बाद अब पानी के सवाल पर विश्व राजनीति संचालित होगी। एक जुमला यह भी चर्चा में है कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिए होगा।

उत्तर प्रदेश में हर साल पानी 70 सेंटीमीटर नीचे जा रहा है। राजधानी दिल्ली के अलग-अलग क्षेत्रों में भूजल का स्तर 50 से 150 सेंटीमीटर तक नीचे चला गया है। हालत यह है कि 1960 में दिल्ली में 10 से 20 मीटर नीचे तक पानी मिल जाता था, अब 45 से 55 मीटर नीचे की गहराई में पानी तलाशना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश के 36 जिले गिरते भूजल-स्तर के मामले में चिंताजनक स्थिति में पहुंच चुके हैं।

विकास के नए तौर-तरीकों में पानी के इस्तेमाल के बीच हम यह भूलते जा रहे हैं कि आने वाले दिनों में पानी आएगा कहां से। लगातार हैंडपंप पर हैंडपंप लगाते जाने से तात्कालिक समस्या तो दूर हो जाएगी, लेकिन इसी रास्ते भूजल स्तर के और नीचे चले जाने की एक बड़ी तबाही भी हमारे सामने आती है। देश के अलग-अलग हिस्सों में धरती फटने की लगातार घट रही घटनाएं हमारे इसी प्रकृति दोहन का कुफल हैं। आजादी के बाद भूमि व्यवस्था नियोजन के लिए चकबंदी की शुरुआत जब से हुई, उसी समय से यह संकट और बड़ा होता गया। देश के जिन इलाकों में चकबंदी हुई है, वहां के तमाम क्षेत्रों में एक साझा विसंगति पाई गई है कि कई सौ बरस पुराने छोटे बांध तोड़ दिए गए। बुंदेलखंड के चित्रकूट जिले में छह किलोमीटर लंबी बंधियों की एक समृद्ध श्रृंृखला इसी कारण टूट गई। इन बंधियों के कारण लगभग 900 बीघा जमीन की सिंचाई हो जाती थी। इस समय वह सारा पानी उतरकर नालों में चला जाता है। यह एक ऐसा उदाहरण है, जिसे आप देश में कहीं भी, किसी भी गांव के किसान से पूछेंगे, तो वह इससे मिलते-जुलते दर्जन भर प्रसंग गिना देगा।

इसी तरह, भूमि सुधार के सवाल पर भूमिहीनों को पट्टे पर जो जमीनें दी गईं, उनमें भी एक लोचा हो गया। यह देखा ही नहीं गया कि किस गांव में किस खाली जमीन का क्या इस्तेमाल था। परिणामस्वरूप, गांव में तालाबों तक पानी पहुंचने के लिए जो उतार के क्षेत्र थे, उन्हें बिना सोचे-समझे पट्टे पर दे दिया गया। लोगों ने बाउंड्री या बंधी बनाकर जमीन घेर ली। जाहिर है, इस वजह से तालाब अपनी मौत मर गए। ऐसे में, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से जिन पुराने तालाबों का जीर्णोद्धार हो रहा है, उनमें खुदाई के बाद पानी पहुंच भी सकेगा, इसकी गारंटी नहीं है। इसलिए आवश्यक है कि तालाबों को पुनर्जीवित करने से पहले यह देख लिया जाए कि पट्टे और अतिक्रमण की स्थिति क्या है।

पुराने समय में देश के जिस हिस्से में पानी की जितनी दिक्कत थी, वर्षा जल संचयन का वहां उतना ही पुख्ता इंतजाम होता था। इसीलिए देश के हर इलाके में पानी के संचयन और सदुपयोग की एक से एक बेहतरीन स्थानीय व्यवस्थाएं रही हैं। पहले जितने धार्मिक, सामाजिक स्थान विकसित किए गए, सब जगह तालाब या बड़े कुंड का निर्माण कराया गया। लेकिन यांत्रिक गति से बढ़ी विकास की रफ्तार ने प्रकृति से लेने के लिए तो हजार तर्क बना लिए, लेकिन उसे लौटाने की व्यवस्था न तो सामाजिक स्तर पर, और न ही सरकारी तौर पर प्रभावी हो पाई। इस साल की बेहतर बारिश पर हम खुशी मना सकते हैं, लेकिन इस बात पर कोई गौर नहीं कर रहा कि अगले कुछ साल अगर अपर्याप्त बारिश हुई, तो फिर क्या होगा?

(लेखक अमर उजाला से जुड़े हैं)

साभार – अमर उजाला

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प्रकृति का संरक्षण प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से सबंधित है। इनमें मुख्यतः पानी, धूप, वातावरण, खनिज, भूमि, वनस्पति और जानवर शामिल हैं। इन संसाधनों में कुछ संसाधन का अधिक उपयोग हो रहा है जिस कारण वे तेज़ गति से कम हो रहे हैं। हमें प्रकृति के संरक्षण के महत्व को समझना चाहिए तथा पारिस्थितिक संतुलन सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। प्रकृति का संरक्षण किसी भी मानवीय हस्तक्षेप के बिना स्वाभाविक रूप से बनने वाले संसाधनों का संरक्षण दर्शाता है।

अक्सर ऐसा देखा जाता है की प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के महत्व पर काफ़ी ज़ोर दिया जाता है क्योंकि यह पृथ्वी पर संतुलित वातावरण बनाए रखने के लिए आवश्यक है। आपकी परीक्षा में आप की सहायता करने के लिए इस विषय पर हमने यहाँ अलग-अलग शब्द सीमा के निबंध उपलब्ध करवाए हैं।

प्रकृति संरक्षण पर निबंध (कंज़र्वेसन ऑफ़ नेचर एस्से)

You can get below some essays on Conservation of Nature in Hindi language for students in  200, 300, 400, 500 and 600 words.

प्रकृति संरक्षण पर निबंध 1 (200 शब्द)

प्रकृति का संरक्षण मूलतः संसाधनों का संरक्षण है जैसे हवा, पानी, धूप, भूमि, वनस्पति, पशु जीवन और खनिज। हमें ये सभी संसाधन बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के प्रकृति द्वारा प्राप्त होते हैं। इन संसाधनों को आगे विभिन्न चीजों के निर्माण करने के लिए नियोजित किया जाता है जो मनुष्यों के साथ-साथ पृथ्वी पर मौजूद अन्य प्राणियों के जीवन को सहज बनाती हैं।

प्राकृतिक संसाधनों का मुख्य तौर पर अक्षय संसाधनों और गैर-अक्षय संसाधनों में वर्गीकरण किया गया है। अक्षय संसाधन वह हैं जिनकी स्वाभाविक रूप से फिर से उत्पत्ति हो सकती हैं। इसमें हवा, पानी और सूर्य का प्रकाश शामिल हैं। आम तौर पर गैर-अक्षय संसाधनों की बजाए अक्षय संसाधनों के उपयोग पर बल दिया जाता है क्योंकि गैर-अक्षय संसाधन तेज़ी से घट रहे है तथा इनकी भरपाई करना मुश्किल है।

प्रकृति का संरक्षण एक ऐसा मुद्दा है जिसे गंभीरता से लिए जाने की जरुरत है। विभिन्न देशों की सरकारें संसाधनों को संरक्षित करने के लिए कई तरीकों का इस्तेमाल कर रही हैं, उसी तरह इस दिशा में लोगों को भी अपना योगदान करने के लिए आगे आना चाहिए। कुछ ऐसे भी तरीके है जिससे आम आदमी प्रकृति के संरक्षण में मदद कर सकता है। उन तरीकों में पेड़ों का रोपण, कागज के उपयोग को सीमित करना, पानी और बिजली की बर्बादी को रोकना, जानवरों का शिकार बंद करना और वर्षा के जल को पुनः उपयोग में लाने वाली प्रणाली को नियोजित करना आदि शामिल है। उपर्युक्त उपायों को सुनियोजित तरीके से अभ्यास में लाना ज्यादा मुश्किल नहीं है। अगर हममें से प्रत्येक ने अपना सार्थक योगदान प्रकृति के संरक्षण के लिए दिया  तो इससे जो भी फायदे होंगे वह मानव जाति के लिए वाकई जबरदस्त होंगे।

प्रकृति संरक्षण पर निबंध 2 (300 शब्द)

प्रकृति हमें  पानी, भूमि, सूर्य का प्रकाश और पेड़-पौधे प्रदान करके हमारी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करती है। इन संसाधनों का उपयोग विभिन्न चीजों के निर्माण के लिए किया जा सकता है जो निश्चित ही मनुष्य के जीवन को अधिक सुविधाजनक और आरामदायक बनाते हैं। दुर्भाग्य से, मनुष्य इन संसाधनों का उपयोग करने के बजाए नई चीजों का आविष्कार करने में इतना तल्लीन हो गया है कि उसने उन्हें संरक्षित करने के महत्व को लगभग भुला दिया है। फ़लस्वरूप, इन संसाधनों में से कई तेज़ गति से कम हो रहे हैं और यदि इसी तरह से ऐसा जारी रहा तो मानवों के साथ-साथ पृथ्वी पर रहने वाले अन्य जीवों का अस्तित्व मुश्किल में पड़ जाएगा।

प्रकृति के संरक्षण से अभिप्राय जंगलों, भूमि, जल निकायों की सुरक्षा से है तथा प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण खनिजों, ईंधन, प्राकृतिक गैसों जैसे संसाधनों की सुरक्षा से है जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि ये सब प्रचुर मात्रा में मनुष्य के उपयोग के लिए उपलब्ध रहें। ऐसे कई तरीके हैं जिससे आम आदमी प्रकृति के संरक्षण में मदद कर सकता है। यहां कुछ ऐसे ही तरीकों का विस्तृत वर्णन किया गया है जिससे मानव जीवन को बड़ा लाभ हो सकता है:-

पानी का सीमित उपयोग

पानी को बुद्धिमानी से इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अगर पानी का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब हमें थोड़े से पानी के लिए भी तरसना पड़ेगा। पानी का सही इस्तेमाल काफी तरीकों से किया जा सकता है जैसे अपने दांतों को ब्रश करते हुए बहता हुआ पानी बंद करके, फव्वारें के जगह बाल्टी के पानी से नहाकर, आरओ का अपशिष्ट पानी का उपयोग पौधों में देकर या घर को साफ करने के लिए इस्तेमाल करके ताकि पानी ज्यादा मात्रा में ख़राब न हो।

बिजली का सीमित उपयोग

प्रकृति के संरक्षण के लिए बिजली के उपयोग को भी सीमित करना आवश्यक है। बिजली की बचत हम कई तरह से कर सकते है जैसे विद्युत उपकरण बंद करके  खासकर जब वे उपयोग में ना हो या फिर ऐसे बल्ब अथवा ट्यूबलाइट का इस्तेमाल करके जिससे कम कम से बिजली की खपत हो उदाहरण के लिए एलईडी लाइट।

ज्यादा से ज्यादा पेड़-पौधे और सब्जियां उगाकर

जितना संभव हो सके उतने पेड़ लगाए तभी हर दिन जो पेड़ कट रहे हैं उनकी भरपाई हो सकेगी। पेशेवर खेती में उपयोग किए जाने वाले रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को प्रतिबंधित करने के लिए कोशिश करें कि घर पर ही सब्जियां उगायें। इसके अलावा लोग पेपर के उपयोग को सीमित करके, वर्षा जल संचयन प्रणाली को नियोजित करके, कारों के उपयोग को सीमित कर और प्रकृति के संरक्षण के बारे में जागरूकता फैला कर अपना बहुमूल्य योगदान दे सकते हैं।

प्रकृति संरक्षण पर निबंध 3 (400 शब्द)

प्रकृति ने हमें कई उपहार जैसे हवा, पानी, भूमि, धूप, खनिज, पौधों और जानवर दिए है। प्रकृति के ये सभी तोहफ़े हमारे ग्रह को रहने लायक जगह बनाते हैं। इन में से किसी के भी बिना पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन का अस्तित्व संभव नहीं होगा। अब, जबकि ये प्राकृतिक संसाधन पृथ्वी पर प्रचुरता में मौजूद हैं, दुर्भाग्य से मानव आबादी में वृद्धि के कारण सदियों से इनमें से अधिकांश की आवश्यकता बढ़ गई है।

इनमे से कई प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अधिक गति से किया जा रहा है जबकि उनका उत्पादन  क्षमता कम है। इस प्रकार प्रकृति के संरक्षण तथा प्रकृति द्वारा उपलब्ध कराये प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की आवश्यकता है। यहां कुछ तरीकों पर एक विस्तृत नजर डाली गई है, जिनसे ये संसाधन संरक्षित किए जा सकते हैं:-

पानी की खपत कम करके

पृथ्वी पर पानी प्रचुरता में उपलब्ध है इसलिए लोग इसका उपयोग करने से पहले इसकी कम होती मात्रा की तरफ ज्यादा ध्यान देना जरुरी नहीं समझते। अगर हम पानी का इसी तेज़ गति से उपयोग करते रहें तो निश्चित ही रूप से हमे भविष्य में गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। पानी को बचने के लिए हम कुछ सरल चीजों को प्रयोग में ला सकते है जैसे ब्रश करने के दौरान नल को बंद करना, वॉशिंग मशीन में पानी का उपयोग कपड़ो की मात्रा के अनुसार करना तथा बचा हुआ पानी पौधों में देकर।

बिजली का उपयोग कम करके

बिजली की बचत करके ही बिजली बनाई जा सकती है। इसीलिए बिजली के सीमित उपयोग को करने का सुझाव दिया जाता है। सिर्फ इतना ध्यान रखकर जैसे कि अपने कमरे से बाहर निकलने से पहले रोशनी को बंद करना, उपयोग के बाद बिजली के उपकरणों को बंद करना और फ्लोरोसेंट या एलईडी बल्बों को ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल में लाना आदि बिजली बचाने में एक महतवपूर्ण कदम हो सकता है।

कागज़ का सीमित उपयोग करके

कागज़ पेड़ से बनता है। अधिक कागज़ का प्रयोग करने से मतलब है कि वनों की कटाई को प्रोत्साहित करना जो आज के समय में चिंता का विषय है। हमे यह सुनिश्चित करने कि जरुरत है कि जितना आवश्यकता है उतना ही कागज़ का उपयोग करें। प्रिंट आउट लेना और ई-कॉपी का उपयोग करना बंद करना होगा।

नई कृषि पद्धतियों का उपयोग करें

सरकार को चाहिए की वह किसानों को मिश्रित फसल, फसल रोटेशन तथा कीटनाशकों, खाद, जैव उर्वरक और जैविक खाद के उचित उपयोग करने सिखाए।

जागरूकता फैलाए

प्रकृति के संरक्षण के बारे में जागरूकता फ़ैलाना तथा इसके लिए इस्तेमाल होने वाली विधि का सही तरीका अपनाना अति महत्वपूर्ण है। यह लक्ष्य तभी प्राप्त किया जा सकता है जब अधिक से अधिक लोग इसके महत्व को समझें और जिस भी तरीके से वे मदद कर सकते हैं करे।

इसके अलावा अधिक से अधिक पौधे लगाना भी बेहद जरुरी है। लोग यात्रा के लिए साझा परिवहन का उपयोग करके और प्रकृति के संरक्षण के लिए वर्षा जल संचयन प्रणाली को नियोजित करके वायु प्रदूषण को कम करने की दिशा में अपना योगदान दे सकते है।

प्रकृति संरक्षण पर निबंध 4 (500 शब्द)

प्रकृति का संरक्षण उन सभी संसाधनों के संरक्षण को संदर्भित करता है जो स्वाभाविक रूप से मनुष्यों की सहायता के बिना बने हैं। इनमें पानी, हवा, धूप, भूमि, वन, खनिज, पौधें और जानवर शामिल हैं।  ये सभी प्राकृतिक संसाधन पृथ्वी पर जीवन को जीने लायक बनाते हैं। पृथ्वी पर मौजूद हवा, पानी, धूप और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के बिना मनुष्य का जीवन संभव नहीं है। इसलिए पृथ्वी पर जीवन तथा पर्यावरण को बरकरार रखने के लिए इन संसाधनों को संरक्षित करना अति आवश्यक है। यहां धरती पर मौजूद प्राकृतिक संसाधनों और इनका संरक्षण करने के तरीकों पर एक नजर डाली गई है:-

प्राकृतिक संसाधनों के प्रकार

  • अक्षय संसाधन:- यह ऐसे संसाधन हैं जो स्वाभाविक रूप से फिर से उत्पन्न हो सकते हैं जैसे वायु, पानी और सूरज की रोशनी।
  • गैर-अक्षय संसाधन:- यह ऐसे संसाधन हैं जो या तो फिर से उत्पन्न नहीं होते या बहुत धीमी गति से बनते हैं जैसे जीवाश्म ईंधन और खनिज आदि।
  • जैविक: ये जीवित प्राणियों तथा पौधों और जानवरों की तरह कार्बनिक सामग्री से आते हैं
  • अजैविक: ये गैर-जीवित चीजों और गैर-कार्बनिक पदार्थों से प्राप्त होते हैं। इसमें हवा, पानी और भूमि शामिल हैं, साथ ही लोहे, तांबे और चांदी जैसी धातुएं को भी इसमें गिना जा सकता है।

प्राकृतिक संसाधनों को भी वास्तविक संसाधन, आरक्षित संसाधन, स्टॉक संसाधन और उनके विकास के स्तर के आधार पर संभावित संसाधन जैसे श्रेणियों में विभाजित किया गया है।

प्रकृति संरक्षण के तरीके

प्रकृति का संरक्षण एक गंभीर विषय है जिस पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है।

प्रकृति के अधिकांश संसाधन तेज़ गति से घट रहे हैं। इसका कारण है इन संसाधनों की मांग अधिक होना जबकि उनके निर्माण की दर कम है। हालांकि, हमे यह समझने की जरूरत है कि प्रकृति ने हमें उन सभी संसाधनों को प्रचुर मात्रा में दिया है जिनकी हमें आवश्यकता है। हमें केवल उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग बुद्धिमानी से करने की आवश्यकता है। इन संसाधनों को संरक्षित करने के लिए हमे  नीचे दिए गए तरीकों का पालन करना चाहिए:

सीमित उपयोग

जल और बिजली दो ऐसी चीजें हैं जो आज के समय में सबसे ज्यादा बर्बाद हो रही हैं। हमारे लिए इन दोनों को बचाने के महत्व को समझना आवश्यक है। कोशिश करें जितनी जरुरत हो उतने ही पानी को उपयोग में लायें। ऐसा ही नियम बिजली पर लागू करना होगा। बिजली के उपकरणों का उपयोग बुद्धिमानी से करें तथा जब वे प्रयोग में ना हो तब उन्हें बंद कर दें। इसी तरह कागज, पेट्रोलियम और गैस जैसे अन्य संसाधनों का उपयोग भी एक सीमित दर में होना चाहिए।

प्रकृति को फिर से हरा भरा बनाएं

लकड़ी के बने पेपर, फर्नीचर और अन्य वस्तुओं के निर्माण के लिए काटे गए पेड़ों की जगह अधिक से अधिक वनरोपण करें। इसके अलावा अपने क्षेत्र के आसपास सफाई सुनिश्चित करें तथा जल निकायों और अन्य जगहों में अपशिष्ट उत्पादों को न फेकें।

जागरूकता फैलाएं

अंत में, जितना हो सके प्रकृति के संरक्षण के महत्व के बारे में उतनी जागरूकता फैलाए।

निष्कर्ष

प्राकृतिक संसाधनों की खपत अपने उत्पादन से अधिक है। यह हम में से हर एक का कर्तव्य है कि प्रकृति के इन उपहारों की बर्बादी को बंद करे और उन्हें बुद्धिमानी से उपयोग करना शुरू करें ताकि पृथ्वी पर पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखा जा सके। उपरोक्त दी विधियों का पालन करके हम प्रकृति के संरक्षण में अपना योगदान दे सकते है।


 

प्रकृति के संरक्षण पर निबंध 5 (600 शब्द)

प्रकृति का संरक्षण मूल रूप से उन सभी संसाधनों का संरक्षण है जो प्रकृति ने मानव जाति को भेंट की है। इसमें खनिज, जल निकायों, भूमि, धूप और वातावरण आदि शामिल हैं तथा इसमें वनस्पतियों और जीवों का संरक्षण भी शामिल हैं। प्रकृति द्वारा दिए ये सभी उपहार संतुलित वातावरण बनाने में मदद करते है तथा ये सब मनुष्य के अस्तित्व और पृथ्वी पर अन्य जीवों के अस्तित्व के लिए उपयुक्त है। इसलिए प्रकृति का संरक्षण अति महत्वपूर्ण है।

प्राकृतिक संसाधनों को उनकी विशेषताओं के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। यहां इस वर्गीकरण पर एक नजर डाली गई है, जिसमें से प्रत्येक को संरक्षित करने के सुनियोजित तरीके हैं:

प्राकृतिक संसाधनों का वर्गीकरण

प्राकृतिक संसाधनों को मुख्यतः नवीनीकृत करने, विकास का स्रोत और विकास के स्तर पर अपनी क्षमता के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। इन्हें आगे उप श्रेणियों में विभाजित किया गया है। इनकी विस्तृत जानकारी इस प्रकार से है:

कुछ संसाधन नवीकरणीय हैं जबकि अन्य गैर-नवीकरणीय हैं यहां इन दोनों श्रेणियों पर विस्तृत रूप से डाली गई है:

  1. नवीकरणीय संसाधन: ये संसाधन वह है जो स्वाभाविक रूप से पुनः उत्पन्न होते हैं। इनमें हवा, पानी, भूमि और सूर्य का प्रकाश शामिल हैं।
  2. गैर-नवीकरणीय संसाधन: ये संसाधन या तो बहुत धीमी गति उत्पन्न होते हैं या स्वाभाविक रूप से नहीं बनते। खनिज और जीवाश्म ईंधन इस श्रेणी के कुछ उदाहरण हैं।

उनके मूल के आधार पर, प्राकृतिक संसाधनों को दो प्रकारों में बांटा गया है:

  1. अजैविक: ये वह संसाधन हैं जो गैर-जीवित चीजों और गैर-कार्बनिक पदार्थों से बनते हैं। इस प्रकार के प्राकृतिक संसाधनों के कुछ उदाहरणों में पानी, वायु, भूमि और धातु जैसे लोहा, तांबे, सोना और चांदी शामिल हैं।
  2. जैविक: ये वह संसाधन है जो जीवित प्राणियों, पौधों और जानवरों जैसे कार्बनिक पदार्थों से उत्पन्न होते हैं। इस श्रेणी में जीवाश्म ईंधन भी शामिल है क्योंकि वे क्षययुक्त कार्बनिक पदार्थ से प्राप्त होते हैं।

विकास के स्तर के आधार पर, प्राकृतिक संसाधनों को निम्नलिखित तरीके से वर्गीकृत किया गया है:

  1. वास्तविक संसाधन: इन संसाधनों का विकास प्रौद्योगिकी की उपलब्धता और लागत पर निर्भर है। ये संसाधन वर्तमान समय में उपयोग लिए जाते हैं।
  2. रिज़र्व संसाधन: वास्तविक संसाधन का वह भाग जिसे भविष्य में सफलतापूर्वक विकसित और उपयोग में लाया जाए उसे रिज़र्व संसाधन कहा जाता है।
  3. संभावित संसाधन: ये ऐसे संसाधन हैं जो कुछ क्षेत्रों में मौजूद होते हैं लेकिन वास्तव में इस्तेमाल में लाने से पहले उनमें कुछ सुधार करने की आवश्यकता होती है।
  4. स्टॉक संसाधन: ये वह संसाधन हैं जिन पर इस्तेमाल में लाने के लिए सर्वेक्षण तो किए गए हैं लेकिन प्रौद्योगिकी की कमी के कारण अभी तक उपयोग में नहीं लाए जा सके हैं।

प्रकृति के संरक्षण के विभिन्न तरीके

चाहे नवीकरणीय हो या गैर नवीकरणीय, जैविक हो या गैर-जैविक, प्रकृति के संसाधनों का संरक्षण होना चाहिए। यहां कुछ ऐसे तरीके दिए गए हैं जो सरकार और व्यक्तियों को प्रकृति के संरक्षण के लिए प्रयोग में लाने चाहियें:

  1. प्राकृतिक संसाधनों का अधिक उपयोग करना बंद कर देना चाहिए। उपलब्ध संसाधनों को अपव्यय के बिना समझदारी से उपयोग करने की जरुरत है।
  2. वन्य जीवों के संरक्षण के लिए जंगली जानवरों का शिकार करना बंद कर दिया जाना चाहिए।
  3. किसानों को मिश्रित फसल की विधि, उर्वरक, कीटनाशक, कीटनाशक, और फसल रोटेशन के उपयोग को सिखाया जाना चाहिए। खाद, जैविक उर्वरक और बायोफलाइलाइजर्स के इस्तेमाल को प्रोत्साहितकरने की जरुरत है।
  4. वनों की कटाई को नियंत्रित करना चाहिए।
  5. वर्षा जल संचयन प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए।
  6. सौर, जल और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय संसाधनों के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  7. कृषि प्रक्रियाओं में इस्तेमाल होने वाले पानी को दोबारा उपयोग में लाने की प्रणाली का पालन करना चाहिए।
  8. कार-पूलिंग जीवाश्म ईंधन की खपत को कम करने का एक अच्छा तरीका है।
  9. कागज के उपयोग को सीमित करें और रीसाइक्लिंग को प्रोत्साहित करें।
  10. पुराने लाइट बल्ब की जगह फ्लोरोसेंट बल्ब को इस्तेमाल करके ऊर्जा की बचत करें जिससे बिजली बचाई जा सके। इसके अलावा जब आवश्यकता नहीं हो रोशनी के उपकरण और इलेक्ट्रॉनिक आइटम बंद करें।

निष्कर्ष

संतुलित वातावरण सुनिश्चित करने के लिए प्रकृति का संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण है हालांकि दुख की बात यह है कि बहुत से प्राकृतिक संसाधन तेज़ी से घट रहे हैं। उपर्युक्त विधियों का पालन करके प्रकृति के संरक्षण के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपना योगदान करना चाहिए।


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